शिमला, 20 अगस्त। हिमाचल प्रदेश की वन एवं चरागाह आधारित अर्थव्यवस्था की अप्रयुक्त संभावनाओं को साकार करने के लिए वन विभाग और भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी-बीआईपीपी) के बीच पांच वर्ष का समझौता ज्ञापन (एमओयू) हुआ है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू की उपस्थिति में हुए समझौते पर प्रधान मुख्य अरण्यपाल डॉ. संजय सूद और आईएसबी-बीआईपीपी के कार्यकारी निदेशक प्रो. अश्विनी छत्रे ने हस्ताक्षर किए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह साझेदारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम है। विज्ञान, स्थानीय समुदाय और सरकार के समन्वय से वन प्रबंधन में व्यापक बदलाव लाया जाएगा तथा स्थानीय वन प्रजातियों की आर्थिक क्षमता का अधिकतम उपयोग किया जाएगा। हरड़, बेल और थांगी (हैजलनट) जैसे संसाधनों की संभावनाओं का भी आकलन होगा।

एमओयू से पहले संयुक्त वन सर्वेक्षण के निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए। इसमें 500 से अधिक वन रक्षकों ने दो लाख से ज्यादा पेड़ों का डेटा और प्रजातियों की तस्वीरें जुटाईं। सैटेलाइट इमेजरी तथा एआई/मशीन लर्निंग से आंकड़ों का विश्लेषण कर मौके पर सत्यापन किया गया। खैर, बांस, चीड़, आंवला, जंगली आम, साल और बुरांश की मैपिंग की गई, जिसे ‘काउंटिंग ग्रीन वेल्थ’ के रूप में प्रकाशित किया गया है।

सर्वेक्षण में पांच जैव-संसाधनों की कुल 22,600 करोड़ रुपये की अप्रयुक्त आर्थिक क्षमता सामने आई। इसमें आंवला 8,700 करोड़, चीड़ की पत्तियां 5,500 करोड़, जंगली आम 4,800 करोड़, साल के बीज 2,400 करोड़ और बुरांश के फूल 1,200 करोड़ रुपये आंके गए हैं। इनके दोहन को पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ सीमा तक सीमित रखा जाएगा।

एमओयू के तहत वन अर्थव्यवस्था एवं सामुदायिक उद्यम, फॉरेस्ट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म, चराई पोर्टल एवं चरागाह डेटाबेस तथा प्रशिक्षण और क्षमता विकास पर काम होगा। पालमपुर से शुरू की गई व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा।

#cmsukhu #Mou #Forest

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *